ठाणे | ठाणे गणेशोत्सव में पर्यावरणपूरक गणेशोत्सव का संदेश तो जोर – शोर से दिया जा रहा है, लेकिन विसर्जन घाटों तक निर्माल्य के साथ प्लास्टिक की थैलियां पहुंचने से इस पूरी मुहिम की जमीनी प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं , ठाणे महानगरपालिका (TMC) द्वारा निर्माल्य अलग से जमा कर उससे खाद बनाने की व्यवस्था की जा रही है, लेकिन अगर निर्माल्य के साथ प्लास्टिक लगातार पहुंचता रहा तो इस पूरी प्रक्रिया पर अतिरिक्त दबाव पड़ना तय है , मौजूदा गणेशोत्सव में ठाणे महापालिका ने निर्माल्य के वैज्ञानिक प्रबंधन की व्यवस्था की है , शुरुआती डेढ़ दिन के विसर्जन के बाद महापालिका के अनुसार 20,703 गणेश मूर्तियों का विसर्जन और करीब 18,600 किलो निर्माल्य का संग्रह किया गया , संग्रहित सामग्री में लगभग 3 प्रतिशत प्लास्टिक पाए जाने की जानकारी भी सामने आई है, जिसे अलग कर MRF केंद्रों के जरिए प्रबंधित किया जा रहा है।
निर्माल्य के साथ प्लास्टिक पहुंचना बड़ी चुनौती ……
गौरतलब है कि ठाणे महानगरपालिका की ओर से पर्यावरणपूरक गणेशोत्सव के लिए अलग – अलग स्तर पर व्यवस्था की जाती है विसर्जन स्थलों पर निर्माल्य के लिए अलग संग्रह केंद्र बनाए जाते हैं और जैविक कचरे को खाद बनाने के लिए भेजा जाता है , लेकिन असली सवाल निर्माल्य जमा होने के बाद नहीं, बल्कि वह घर से विसर्जन घाट तक किस रूप में पहुंचता है इस पर है यदि फूल , हार और पूजा सामग्री प्लास्टिक की थैलियों में भरकर लाई जाती है तो निर्माल्य की छंटाई के दौरान प्लास्टिक अलग करने का अतिरिक्त काम करना पड़ता है , इससे जैविक कचरे की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है और प्लास्टिक के अलग प्रबंधन की जरूरत बढ़ जाती है , यही वजह है कि पर्यावरणपूरक गणेशोत्सव को केवल विसर्जन घाटों पर व्यवस्था करने तक सीमित रखने के बजाय निर्माल्य के स्रोत से ही प्लास्टिक रोकने की रणनीति पर जोर देने की जरूरत है ।
केवल बैनर और अपील से नहीं बदलेगी आदत …..

ज्ञात हो कि नागरिकों को पर्यावरणपूरक गणेशोत्सव का संदेश देने के लिए हर साल अभियान चलाए जाते हैं लेकिन केवल विसर्जन के दौरान लगाए गए बैनर , पोस्टर या लाउडस्पीकर से लंबे समय से चली आ रही आदतों में बदलाव लाना आसान नहीं है , निर्माल्य किस तरह लाना है प्लास्टिक की थैली का इस्तेमाल क्यों नहीं करना है और उसके बदले कौन से विकल्प इस्तेमाल किए जा सकते हैं इन सवालों पर लगातार और व्यावहारिक जन जागरूकता जरूरी है , पर्यावरणपूरक उत्सव का मतलब केवल प्लास्टर या प्लास्टिक से बचना नहीं , बल्कि पूजा सामग्री से लेकर विसर्जन और उसके बाद कचरा प्रबंधन तक पूरी प्रक्रिया को पर्यावरण के अनुकूल बनाना है ।
18.6 टन निर्माल्य संग्रह, फिर भी प्लास्टिक की मौजूदगी
बता दे कि ठाणे महापालिका की व्यवस्था के तहत संग्रहित निर्माल्य को अलग – अलग स्थानों पर वैज्ञानिक तरीके से संसाधित किया जा रहा है उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक हिरानंदानी एस्टेट , ऋतु पार्क और कौसा स्थित जैव – कंपोस्टिंग सुविधाओं में निर्माल्य पर प्रक्रिया की जा रही है प्लास्टिक को अलग करके MRF केंद्रों के माध्यम से प्रबंधित किया जा रहा है ।
यह व्यवस्था महत्वपूर्ण है, लेकिन सवाल यह है कि प्लास्टिक को निर्माल्य तक पहुंचने से पहले ही क्यों नहीं रोका जाए ?
अगर नागरिकों को घर से ही निर्माल्य अलग और प्लास्टिक से मुक्त लाने की आदत डाली जाए तो महापालिका की छंटाई व्यवस्था पर दबाव कम हो सकता है और जैविक कचरे के पुनर्चक्रण की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है।
साल भर चले ‘निर्माल्य प्लास्टिकमुक्त’ अभियान
पर्यावरण विशेषज्ञों और जागरूक नागरिकों की मांग है कि ‘निर्माल्य प्लास्टिकमुक्त’ और ‘प्लास्टिकमुक्त उत्सव’ की मुहिम सिर्फ गणेशोत्सव तक सीमित नहीं रहनी चाहिए , स्कूल, कॉलेज, गणेश मंडल, हाउसिंग सोसायटी, बाजार और नागरिक संगठनों को इस अभियान से जोड़ा जा सकता है पूरे साल चलने वाली जनजागरूकता मुहिम के जरिए लोगों को यह समझाया जा सकता है कि पूजा सामग्री को प्लास्टिक में भरकर फेंकना पर्यावरणपूरक उत्सव की भावना के खिलाफ है , ठाणे महापालिका ने पहले भी पर्यावरणपूरक गणेशोत्सव और शाडू मिट्टी की मूर्तियों को बढ़ावा देने जैसी पहल की है , 2026 में महापालिका ने शाडू मिट्टी की मूर्तियों को प्रोत्साहित करने के लिए भी अभियान शुरू किया था ।
अलग संग्रह व्यवस्था और स्पष्ट निर्देश की जरूरत
विसर्जन घाटों पर निर्माल्य और प्लास्टिक के लिए अलग – अलग संग्रह व्यवस्था , पर्यावरणपूरक थैलियों के विकल्प और नागरिकों के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन उपलब्ध कराना जरूरी है , साथ ही गणेश मंडलों और सोसायटियों को उत्सव शुरू होने से पहले ही यह जानकारी दी जा सकती है कि निर्माल्य को किस तरह एकत्रित किया जाए और उसे प्लास्टिक से कैसे अलग रखा जाए , इससे महापालिका की व्यवस्था केवल कचरा जमा करने तक सीमित नहीं रहेगी , बल्कि कचरा पैदा होने से लेकर उसके अंतिम प्रबंधन तक पूरी श्रृंखला में सुधार किया जा सकेगा ।
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मुख्यमंत्री को सौंपे गए निवेदन में भी उठाया गया मुद्दा
निर्माल्य के साथ प्लास्टिक के इस्तेमाल और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े इस मुद्दे की ओर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का ध्यान निवेदन के माध्यम से आकर्षित किया गया है , मांग यह है कि पर्यावरणपूरक गणेशोत्सव को केवल उत्सव के कुछ दिनों की मुहिम न बनाकर पूरे साल चलने वाला नागरिक जागरूकता अभियान बनाया जाए , पर्यावरण अभ्यासक डॉ. प्रशांत सिनकर ने कहा कि निर्माल्य से खाद बनाना निश्चित रूप से उपयोगी पहल है , लेकिन पर्यावरण संरक्षण के लिए निर्माल्य संग्रह के चरण पर ही प्लास्टिक को रोकना जरूरी है , उनके मुताबिक इसके लिए उत्सव के दौरान ही नहीं बल्कि पूरे साल लगातार जन जागरूकता की आवश्यकता है , ठाणे में पर्यावरणपूरक गणेशोत्सव की दिशा में हो रहे प्रयासों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल व्यवस्था की संख्या नहीं, बल्कि नागरिकों की आदत में बदलाव का है जब तक निर्माल्य प्लास्टिकमुक्त होकर संग्रह केंद्रों तक नहीं पहुंचेगा, तब तक प्लास्टिकमुक्त उत्सव का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा ।
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